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24/03/2025 Suraj Tiwari Inspiration Views 118 Comments 0 Analytics Video Hindi DMCA Add Favorite Copy Link
सच्चा तीर्थ

सुदेशनी अम्मा का जीवन संघर्षों से भरा था। पचहत्तर साल की उम्र में वह गाँव के लोगों के लिए एक प्रेरणा थी। उनके दो बेटे जवान होकर असमय चले गए थे, और पति का भी सालों पहले देहांत हो गया था। अब उनके पास बचे थे सिर्फ यादें और एक पुरानी हथकरघा मशीन। इसी मशीन से वह दिन-रात कपड़े बुनती रहती थीं। बदले में कोई उन्हें थोड़े से चावल दे जाता, तो कोई गेहूँ या ज्वार। यही उनकी रोटी का सहारा था। हर गुजरते हुए व्यक्ति को वह मुस्कुराकर "नमस्ते" कहना नहीं भूलतीं। गाँव के बच्चों से उन्हें बहुत लगाव था, और उनके आने से वह खुश हो जाती थीं। बच्चे कभी-कभी शोर मचाते, कभी खिलखिलाते तो कभी अम्मा से कहानियाँ सुनने आ जाते। सुदेशनी उन्हें हमेशा अपने पास बिठाकर मीठे शब्दों में समझातीं और खुशियाँ बांटतीं। एक दिन गाँव के सरपंच, दिनेश बाबू, गाँव में एक छोटे-से अस्पताल के लिए चंदा इकट्ठा करने निकले। जब वह सुदेशनी अम्मा के घर पहुँचे, तो उनकी हालत देखकर उनके दिल में अम्मा के लिए करुणा उमड़ी। वह बोले, “अम्मा, तुम्हारी हालत देख कर मन भारी हो गया है। चाहो तो मैं तुम्हें सरकारी सहायता दिलवाने की कोशिश कर सकता हूँ। तुम्हें किसी के सहारे की ज़रूरत नहीं होगी।" सुदेशनी अम्मा के चेहरे पर हल्की मुस्कान उभरी, और उन्होंने गर्व से कहा, “बेटा, भगवान ने मुझे दो हाथ दिए हैं, और मेरी यह हथकरघा मशीन मेरा पेट भरने के लिए काफी है। किसी के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं। मैं मेहनत करूँगी, फिर भी अपना स्वाभिमान बनाए रखूँगी। तुम बस यही कहने आए थे?” दिनेश बाबू ने थोड़ा संकोच करते हुए कहा, "नहीं अम्मा, मैं गाँव में छोटे-से अस्पताल के लिए चंदा इकट्ठा कर रहा हूँ। तुमसे आशीर्वाद लेने आया था।" सुदेशनी के चेहरे पर एक नई चमक उभरी। उनके चेहरे पर झुर्रियों के बीच आशा की किरण जैसे झलकी। "तो तू गाँव में अस्पताल बनवाएगा?" उन्होंने उत्साह से पूछा। "हाँ, अम्मा," दिनेश बाबू ने विनम्रता से कहा। "अगर आपका आशीर्वाद साथ हो, तो एक दिन यह सपना जरूर पूरा होगा।" अम्मा धीमे-धीमे चलकर अपने पुराने संदूक तक गईं, जिसमें उनके जीवनभर की छोटी-छोटी जमा-पूंजी थी। उन्होंने संदूक से एक पुरानी थैली निकाली और उसमें से कुछ मुड़े-तुड़े नोट बाहर निकाले। दिनेश बाबू की हथेली पर तीन सौ रुपये रख दिए और बोलीं, “बेटा, सोचा था कि ये पैसे लेकर तीर्थ यात्रा पर जाऊँगी। जीवन में एक बार केदारनाथ जाकर भगवान का दर्शन करने की इच्छा थी, पर अब लगता है कि तेरे इस अस्पताल के लिए ये पैसे दे देना ही मेरे लिए सच्चा तीर्थ होगा।” दिनेश बाबू थोड़े भावुक हो गए, “पर अम्मा, यह आपके तीर्थ यात्रा के लिए जोड़े पैसे हैं। आप केदारनाथ नहीं जाएंगी?” सुदेशनी अम्मा ने विनम्रता से मुस्कुराते हुए कहा, "बेटा, इस गाँव के लोगों की सेवा से बढ़कर कोई तीर्थ नहीं हो सकता। तुम इस अस्पताल का काम शुरू करो, और यही मेरा तीर्थ होगा। मेरी मेहनत का फल इस काम में लगेगा, तो मुझे केदारनाथ जाने की जरूरत नहीं।" अम्मा फिर अपने काम में जुट गईं, लेकिन आज उनके चेहरे पर एक संतोष था, एक ऐसा संतोष जो जीवन भर की सेवा और त्याग से मिला था।

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